Wednesday, January 8, 2014

परमवीर का सार



चर्म है, रोग है,
नेत्र है, अंधियार है.

आशंकाओं से परिपूर्ण जीवन परमवीर का सार है.

चिंतामग्न भूलोक बैठा, रक्त रंजित द्रोण है,
पार्थ व्यथा सुनने को, हरि मंद मंद व्याकुल है.

समय का निश्चित चक्र, पर्वत सा विस्तार है,
भीष्म है चिता पर, धृतराष्ट्र भी तैयार है.

आशंकाओं से परिपूर्ण जीवन परमवीर का सार है.

धर्मराज का इंद्रप्रस्थ, मर्यादा पुरुषोत्तम की अयोध्या,
सीता पर लंका दहन, द्रौपदी पर महाभारत,
युगों युगों की परंपरा है, नश्वरों की यह प्रथा है
युद्ध का शंखनाद वीर का प्रमाण है.

मत झुको, मत रुको, मत करो करुणा विलाप,
धर्म हित में, राष्ट्र हित में, तांडव परमार्थ है.

रात्रि के अंतिम प्रहर से संध्या के उद्घोष तक,
समस्त विश्व का माँ भारती पर हो रहा प्रहार है,
जिस कृष्ण की चेतावनी से सिहर उठा कौरव समाज,
उस कृष्ण की आज तुमसे एक यही गुहार है.

धर्म हित में, राष्ट्र हित में, तांडव परमार्थ है.
आशंकाओं से परिपूर्ण जीवन परमवीर का सार है ||


- मुखिया भोजपुरी

छवि शिष्टाचार:http://jairadhekrishna.com/book.php  

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